लाल रंग
मैं देख सकता हूं,
उनकी दुनिया को रंगों से भरी हुई,
हल्की और उजले रंगों से,
कदमों से लेकर सांसों तक।
उन्माद से भरा हुआ।
फिर महीने की एक तारीख आती है
हमेशा की तरह दोहराता हुआ,
वह लाल रंग......गाढ़ा
जिसकी बूंदे बाकी रंगों पर गिरकर
फैलती जाती है।
इस लाल अंधेरे से
दर्द झलकता है,
जिसकी तब्दीली उनके होठों की मुस्कुराहट
पर नजर आने लगती है।
और शर्म,
जो दूसरों के व्यवहार में नजर आने लगता है।
दर्द को तो छुपाया जा सकता है
पर मुश्किल इस शर्म का है-
और इसे छुपाने का एक तरीका है,
( बहुतों में से एक)
"अखबार का इस्तेमाल करना"
और उस लाल रंग को ढका दिया जाता है।
अखबार के पन्नों से
(ताज्जुब कि इस पर लाल रंग नहीं फैलता)
मैं देख सकता हूं,
हर तरफ अखबार ही अखबार,
(इसका माजरा क्या है आखिर?)
मालूम पड़ा-
ये वही अखबार है
तो पैड खरीदते वक्त,
एक इशारे पर
दुकानदार लपेट कर देता है।
(ताकि कानो कान खबर ना हो कि
ये पैड है,
और हम चू.... को यह पता भी नहीं चलता है)
खैर!
फिर हल्के और उजले रंगों की दुनिया
खुल जाती है।
उन्मादो में उड़ती हुई।
फिर एक बार और
दोहराता हुआ आता है... लाल रंग,
जिसकी शर्म छुपाना जरूरी है,
और हमारी सड़ी हुई मानसिकता को
संतुष्ट करने के लिए
दुकानदार ने... अखबार बचा के रखे हैं।