कुछ तो बात है
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जाने क्या बात है, कुछ तो बात है तुझमे,
मुकम्मल होंगे ख्वाब, यकीन फिर जगने लगा है
बेज़ार मृत सी पड़ी, उम्मीद उफनने लगी है मुझमें
खत्म है आंखों का मलाल, समा सुरमई सा हो गया है,
तुमसे मुकम्मल है जिंदगी, तिश्नगी कहने लगी मुझसे,
मरकर फिर जी उठी, रहबर जीने की वजह है तुझमें।
क्यों मैं खुद में पूर्ण नही, क्यों जहां दिखता है तुझमें,
जरा अब जवाब दे, क्या मेरी भी यही जगह है तुझमें।
पल पल मेरी सोच पर काबिज रहती हैं तुम्हारी यादें,
कहना कुछ और चाहकर कहती कुछ और हैं मेरी बातें।
लिखना चाहती हूँ खुद को, लिख जाती हूँ तुम्ही को,
अब तो बता दे किस जुर्म की यह सजा मिली है मुझको।
इश्क करना गर गुनाह है गुनाह तो हो चुका हमसे,
अकेले हम गुनहगार नही शामिल तुम हर गुनाह में।
क्यों हलाहल मेरे हिस्से में रहा सुधा सारी तुम ले गए,
एक बूंद अमृत की अब क्या बची नही मेरे हिस्से में।
विनय...दिल से बस यूँ ही