तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।। (शुक्लयजुर्वेद, ३४, १)
आज गुरू पूर्णिमा है। इस पावन पर्व पर मैं प्रार्थना करता हूँ कि मेरा मन शुभ संकल्प लेने वाला बने। मन में सदाचार, लोककल्याण, दृढ़ संकल्प और सद्भावना सदैव जागृत हो। सदमार्ग पर चलूँ, सदगुणों, सत्कर्मों में मेरा मन प्रवृत्त हो। मेरे जीवन में आये उन सभी लोगों को में प्रणाम करता हूँ जिन्होंने मुझे अक्षर ज्ञान दिया, साहित्य में रस जगाया, जीवन में सुख दु:ख को स्वीकार कर आगे बढ़ने का हौसला बढ़ाया। मेरी माँ जो केवल एक माँ ही नहीं पिता बनकर चलना सिखाया। माँ कि धार्मिक वृत्ति ने धार्मिक पुस्तकों की ओर मुझ में रूचि उत्पन की। स्वयं अनपढ़ होकर भी रामायण, महाभारत और पुराणादि के कई प्रसंग हमें सुनाये। मेरा परिवार जो सदा मेरे साथ चलते हुए रास्ता बनाता गया। प्राथमिक शिक्षा से लेकर पीएच. डी तक पढ़ाने-सिखाने और मार्गदशित करने वाले गुरूओं को मेरी स्मरणांजलि। जो प्रत्यक्ष रूप में मेरे गुरू न होने पर भी मुझे समय समय पर जीवनोपयोगी ज्ञान देने वाले गुरुजनों, मेरे सगा-संबंधियों, मित्रों, सहपाठियों, सहाध्यापकों, मेरे विद्यार्थियों और मेरे संपर्क में आनेवाले हर व्यक्ति जो मुझे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मुझे कुछ न कुछ सीखा गये। उन सभी को मेरा प्रणाम। मेरे विरोधियों, दुश्मनों और मेरा अहित सोचने और करने वालों को भी प्रणाम, जिन्होंने मुझे जीवन की कड़वी सच्चाई दिखाई।
मुझे साहित्य जगत में लाने वाले साहित्यकारों में सबसे अधिक साथ देनेवाले हिंदी की सुप्रसिद्ध लेखिका नासिरा शर्मा को मेरा प्रणाम। जिन्होंने मेरे काव्यसंग्रह 'मृत प्यार' में भूमिका लिख कर साहित्य जगत में मेरा पहला कदम रखवाया। गुजराती साहित्यकारो, लोक साहित्य के क्षेत्र में भी गुजराती साहित्य और दक्षिण गुजरात के आदिवासी लोक साहित्य के जाने माने कई नामी विद्वान साहित्यकारों, संशोधकों, आलोचकों और संपादकों का भी आभार मानता हूँ। सोशियल मीडिया में मेरे दोस्त, कवि, आलोचक एवं अन्य ज्ञानीजनों को मेरा कोटि कोटि वंदन....💐💐💐💐💐
@दीपेश कामडी 'अनीस'
05, जुलाई 2020