# टेढ़ा
भाव क्यों टेढ़ा हुआ है ? घाव क्योंकर ये लगा है ?
झाँककर तू देख रे मन तू कहाँ बहका हुआ है |
यातनाएँ कितनी-कितनी बाँट रखी हैं सभी को ,
अहं के झूठे झरोखे बंद कर बैठा हुआ है -------
बंद संवादों की गलियाँ ,मार्ग भी अवरुद्ध हैं सब ,
चुभ रहे है शूल कितने ,क्यों सभी हैं क्रुद्ध कितने ?
सब यहाँ तन्हा,डरे हैं ,कौन जो न जानता है ?
झूठ के हर बाँकडे पर काग एक बैठा हुआ है ----
मन की क्यारी सूखती है ,बारिशों को सूँघती है ,
विफ़लता के भय से जैसे सफ़लता को ढूँढती है |
पर नहीं आसान इतना पूर्व का सब-कुछ किया है,
ये परीक्षा है तेरी मन ,कैसे इससे निकलता है -----| |
डॉ. प्रणव भारती