मोक्ष
जबलपुर के पास पनहेरा नामक कस्बे में रामसिंह नाम का एक किसान रहता था। वह बहुत ईमानदार, आदर्षवादी एवं नेकदिल व्यक्ति था परंतु धनोपार्जन की प्रबल इच्छा उसके मन में हमेशा रहती थी और इन्ही कारणों से उसे रात्रि में नींद भी नही आती थी। एक दिन एक महात्मा वहाँ से गुजर रहे थे। रामसिंह ने उन्हें आदरपूर्वक अपने घर पर आमंत्रित किया और उनकी बहुत सेवा सुश्रुषा की। रामसिंह ने उचित समय देखकर महात्मा जी के सामने अपनी समस्या बताई। यह सुनकर उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि इसका निवारण तो बहुत आसान है। तुम अपनी संपत्ति का उपयोग जरूरतमंदो की सेवा में करो और अपना अधिकतम समय प्रभु भक्ति में व्यतीत करो तुम्हारी समस्या का निवारण स्वमेव ही हो जायेगा।
स्वामी जी की बात मानकर रामसिंह ने व्यवसाय एवं संपत्ति की जवाबदारी अपने पुत्र को सौंपकर जरूरतमंदों की हर संभव मदद करने लगा और गांव में लोगों के आपसी विवादों को सुलझाने में भी सहायता करने लगा। कुछ समय पश्चात उसके आचार विचार में परिवर्तन होकर वह बहुत विनम्र और मधुभाषी हो गया। एक दिन वही साधु पुनः उस गांव में पधारे, रामसिंह ने उनसे मिलकर बताया कि मैं चैन की जिंदगी जी रहा हूँ और रात्रि में भरपूर नींद लेकर सो रहा हूँ। अब मुझे मोक्ष की आकांक्षा है, कृपया मार्गदर्शन देने की कृपा करें।
महात्मा जी ने मुस्कुराते हुए कहा कि तुम अपने मन से अपेक्षाओं एवं मोह, माया का त्याग कर दो तो तुम्हें मोक्ष की प्राप्ति स्वमेव ही हो जायेगी। आज जो तुम संतुष्ट होकर सुखी जीवन जी रहे हो यही मोक्ष के पथ का पहला पडाव है जिसे तुम अनुभव कर सकते हो। इसी पथ पर बढते चलो तो एक दिन अवश्य ही मोक्ष को प्राप्त हो जाओगे। इतना कहकर महात्मा जी अपने गंतव्य की ओर आगे बढ गया।