खूब बरसी थीं आंखें कल
आज़ भी मन
गीला गीला सा है
अभी भी छाई है
कुछ बदरी भीतर
नहीं जगा है अभी भी
मेरा सूरज भीतर
हां कुछ धुंधले से
सितारे हैं कहीं बाहर
दूर बहुत दूर
पर बस सपने सी
महसूस होती है
दूर उन सितारों की टिमटिम
और
नहीं सूखा है मन पूरा
कुछ कुछ गीला
अभी भी बाकी है
:- भुवन पांडे
#गीला