#गीला
स्वप्न गीला रह गया था
आँख में पानी भरा था
बेबसी से भीगता था
बिन कहे कुछ कह गया था
हृदय ने अक्षर न जाने
स्नेह से कितने सजाए
और सिंदूरी गगन में
जाने कितने गीत गाए
ठोकरों में आ गए हैं
कुनमुनाए से सहारे
श्वेत शब्दों में पिरोकर
मौन भी कुछ कह गया था
मन हुआ आकाश सा है
चाहता है भीग जाऊँ
और होठों पर सजाकर
मुक्ति का वो गीत गाऊँ
किंतु बहकी साज़िशों ने
ऐसा कुछ हमला किया था
विगत ने कुछ यूं छला था .......
स्वप्न गीला रह गया था ..........