# vicious (शातिर )
मन के कोलाहल में झूठी आँकाक्षाओं के सिरहाने पर
और हृदय में उगते शातिर कोलाहल को तीर बनाकर
कैसे पाएँगे लक्ष्य को जो जीवन का सत्य अटल है
जीवन तो दो दिन का ही है ,सत्य यहाँ जिसका संबल है
कितने -कितने सागर पीए ,कितने बेबस होकर जीए
कितनी चतुराई दिखलाई किन्तु किसी भी काम न आई
संबंधों से संबोधन तक शातिर तीर चुभाए सबको
गरल मिला फिर क्यों चिंता है ,परिणाम अपने कर्मों का
यहीं स्वर्ग की मोहकता है ,यहीं नर्क का ताना -बाना
सोए न जागें हम सब ही ,वरना फिर कैसा पछताना ?
डॉ. प्रणव भारती
pranavabharti @gmail.com .