रोज़ सोचती हूँ कि नकारात्मक न सोचूं,पर जैसे ही अख़बार खोलती हूँ तमाम घटनाएं मेरे दिमाग़ में उथल पुथल मचाने लगती हैं,और मैं न चाहते हुए भी ये सोचने पर विवश हो जाती हूँ कि मेरे साथ भी ये हो सकता है या मैं भी किसी के साथ ऐसा कुछ कर सकती हूँ, मेरा ख़ुद के ऊपर से विश्वास उठने लगता है कि क्या मैं जो भी आज हूँ आगे वहीं रहूंगी या मैं भी इनके तरह हो जाऊंगी जो कभी मेरी तरह हुआ करते थे,,,, हमारा व्यवहार सदैव एक-सा नहीं रहता,किसी भी मनुष्य का अमानवीय व्यवहार अकेले में ही पता चलता है। कोई भी इंसान ज्यादातर गलतियां अकेले में ही करता है,वह कितना नीचा गिर सकता है यह तभी पता चलता है जब वह सुनसान रास्ते पर अकेला जा रहा हो।