ऐसे कैसे कह दूँ,
#आभारी हूँ तुम्हारी?
तुमने ऐसा कुछ किया क्या?
कभी कालिंदी तट पर,
कभी कदंब मूल पर,
मैं बार बार रूठी
तुमने बार बार मनाया।
तो इसके लिए आभार मानूँ क्या?
ये तो हमारी, प्रीत की रीत थी।
मैं तो इसलिए रूठा करती थी,
जिससे तुम्हें मनाने का आनन्द मिल सके।
तुमने कभी दुर्वासा के क्रोध से,
कभी कौरवों के पाप से,
मेरी बार बार रक्षा की।
कई बार मुझे राह दिखाई।
तो इसके लिए आभार मानूँ क्या?
ये तो तुम्हारा सखा धर्म था।
तुमने अपना धर्म निभाया,
तुमने मुझे सखी कहा,
तो मैंने तुम्हें पुकार लिया।
तुम मेरी पुकार सुनते ही आ गए
तो इसके लिए आभार मानूँ क्या?
तुमने मेरे समर्पण को स्वीकार किया,
राणा के विष से मेरी रक्षा की।
तो इसके लिए आभार मानूँ क्या?
जब तुम ही मेरे सर्वस्व हो,
तो मेरी रक्षा और कौन करता गिरधर
अब मैं इसके लिए,आभार मानूँ क्या?
मैं ये रूठने मनाने के आनंद,
रक्षा करने और राह दिखाने
का कर्तव्य पूरा करने के लिए मैं
तुम्हारी किंचित भी #आभारी नहीं हूँ।
में #आभारी हूँ, तुम्हारे उस बड़प्पन की
जो मुझे अपना अंश मानता है।
जो मुझे अपना विस्तार कहता है।
हाँ माधव, मैं #आभारी हूँ तुम्हारी
क्योंकि मैं तुमसे ही जन्मी हूँ,
क्योंकि तुममें ही विस्तृत हूँ,और
क्योंकि मैं तुम में ही विलीन हो जाऊंगी।।
कान्हा, मैं सच में तुम्हारी आभारी हूँ।।
#आभारी = #शुक्रगुज़र
(यद्यपि पूर्णतः समानार्थी नहीं है)