"चिणुक जैसी र ई गे छै, तु म्यर म न में,
ईथा चानू उथा चानू,तु नि रैनि बटां में,
काफल जैसी अयि जै यै, म्यर पहाड़क डवाँ में,
चिणुक जैसी र ई गे छै, तु म्यर म न में,
कतु भ ल मानि छिय ,उ जुनालि रात में,
ह्य जैसी तु रइ ज्यै ,य हिमाल क डनां में,
घुघुत ज स बैठि र गऊ,तेरि ध्यैक द्वार में,
त्यर बातों कि याद आ ब,चिणुक जैसि र ई गे।"
~महेश रौतेला
"चिणुक(आग की नन्हीं चिनगारी) जैसी रह गयी है, तू मेरे मन में,
इधर देखता हूँ, उधर देखता हूँ, तू रास्तों में नहीं मिलती है,
काफल जैसी आ जाना,पहाड़ के वृक्षों में,
चिणुक जैसी रह गयी है, तू मेरे मन में,
कितना अच्छा लगता था,उस चाँदनी रात में,
हिम जैसी तू रह जाना,हिमालय के शिखरों पर,
घुघुत(पक्षी) जैसा बैठा रह गया हूँ, तेरी चौखट पर,
तेरी बातों की याद अब,चिणुक जैसी रह गयी है।"
**महेश रौतेला