My Individuality Poem...!!!
यारों आज चंद कदम ही चले हम और
दीखता हर-सूँ ख़ौफ़ज़दा-सा नज़ारा है
हाथोंकी चँद टेढ़ी-सी लकीरोंके खेल मे
लगता आज हर बंदा बेचारा हारा-सा है
कुछ आसारों से जो लगते थे शकमंद
इसलिए बिलावजह उसे दर्दी माना है
मर्ज़नुमा बदन आधा नंगा-सा है सबका
हर बंदा जैसे किसी मुसीबतोंका मारा है
अस्पताल में ढंग से बात तक न करते हैं
फिर दाकतरो ने बस पोज़िटीव माना है
चाहता कुछ होता कुछ, इंसानोंसे आज
इन्सान शायद खुदसे ही खुद बेसहारा है
बेसब्रियों बेताबियों बद-अख़लाक़ियों
बदकलामियोंसे हर मरीज़को नवाज़ा है
जेबों पे जबरन जुर्म दर्ज कर जुर्माना भी
वसुलने पर हर बेबस पेशेवर आमदाँ है
रब करे सब्र हर मरीज़को नसीब हो यहाँ
दानिशमंदो से दानवों का चलन ज़्यादा है
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