#थोड़ा_है_थोड़े_की_जरूरत_है ।
ये सच इंसान की आवश्यकताओं का कोई अंत नही । परन्तु उससे भी बड़ा सच ये है कि यही आवश्यकताएं इंसान में उन्नत्ति और विकास की इक्छा जगातीं हैं । यदि थोड़े में संतोष हो जाये तो इंसान एक जगह ठहर जाता है । कर्म प्रधान समाज के लिए ये परम् आवश्यक है कि थोड़ा है थोड़े की जरूरत है वाली अवधारणा को महत्व दिया जाए । परन्तु यहां भी सावधान रहने की जरूरत है कि थोड़े की जरूरत के लिये हम सार्थक प्रयत्न करें । गलत रास्तों से थोड़ा नही बहुत कुछ आता है पर वो बहुत कुछ हमसे सबकुछ छीन भी लेता है । आवश्यकताओं की पूर्ति किजिये पर पुरुषार्थ करके । स्वयम को सिद्ध करके जो प्राप्त किया जाता है वो स्थिर रहता है और ना भी रहे तो आप पुनः अपने अनुभव से उसमे जान फूंक सकते हैं । उसे दोबारा प्राप्त किया जा सकता है । मार्ग हमे चुनना है । प्राथमिकताएं हमे तय करनी हैं । पैसा सबकुछ नही पर सबकुछ से कम भी नही । ये आपको आपके होने का एहसास दिलाता है ।
शौक हर इंसान के होते हैं । और उन्हें पूरा भी करना चाहिए । हर जगह पैसा बचाने वाली अवधारणा सही नही होती । जीवन छोटा सा है जब जाएं तो मन मे ये मल्लाल ना रहे कि ये नही कर पाए वो नही कर पाए । पर कीजिये स्वयम की योग्यता की बूते । बचत भी आवश्यक है पर उचित जगह पर । अनावश्यक बचत उस इंसान के काम कभी नही आती बल्कि बाद वाले उस बचत का लाभ लेते हैं । इससे अच्छा अपने जीवन काल मे उसका उचित दोहन किया जाए । सभी जिम्मेदारियां सही तरह से पूर्ण कर फिर क्यों ना थोड़ा अपने लिए जिया जाए ।
इसलिए थोड़े की चाह हमेशा रखिये । क्योंकि यही चाह आपको निरन्तर चलायमान रखती है । वह सब कुछ देती है जो आपके लिए सपना है । अपने छोटों में संतोष किभावना मत भरिये । ये सन्तोष ही जड़ता है ।
जिस दिन पैसा होगा वो दिन कैसा होगा । इसे रहस्य मत रहने दीजिए बल्कि इस रहस्य को भेद डालिये । वो दिन कैसा होगा ये देख डालिये ।
थोड़े की चाह जरूरत हमेशा रखिये फिर देखिए जिंदगी और भी खूबसूरत होगी ।
अतुल कुमार शर्मा "कुमार"