ए चाँद तू तो मनचला है
भँवरे की तरह तेरा स्वभाब हो चला है ||
तू तो किसी एक का नहीं हो पाया
कभी ईद का तो कभी करवा चौथ का हो गया,
किसी गरीब के लिए रोटी सा बन गया तो कभी,
किसी बच्चे का रिस्तेदार बनगया,
कभी काव्य नायिका का श्रृंगार बन गया तो
कभी भगवान के मस्तक की शोभा बन गया ||
कया इसी लिए तू इतना इतराता है
ज़रा इतना तो बता मुझे से तेरा बैर कैसा
सब के लिए तू शीतलता बरसाए
मैं तेरा गैर कैसा??
कया मेरी हालत पर तुझको तरस नहीं रत्ती भर
बादलों के बीच से छुप छुप निकल के
हँसता रहता क्यों मेरी तन्हाई पर???