मैं बैठा था घर के आंगन में
तुम छत पर केश सूखा रही थी
ना जाने कौन सा गाना तुम गुनगुना रही थी
नज़रों ने मेरी तुम्हें जो देखा
शर्म से अपनी पलकें झुका रही थी
पलकें उठी नज़रे मिली
लगा जैसे नज़रों से इश्क का इजहार कर रही थी
मुस्कुरा रहे थे हम मुस्कुराए जो तुम
दिल की धड़कने फिर बढ़ रही थी
इशारों के इस खेल में
हमने ये दिल तुम्हारे नाम कर दिया
✍KP SHAYAR
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