Hindi Quote in Blog by Roopanjali singh parmar

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प्रेम❤️ और विरह💔

प्रेम को प्रकट करने के लिए अथवा यह कहना अधिक उचित होगा कि प्रेम को स्वीकारने के लिए और स्वयं के हृदय की भावनाओं को अभिव्यक्त करने के लिए प्रेमी-प्रेमिका मिलते हैं, और इस मिलन को स्वीकृति देते हैं।
परन्तु विरह की घड़ी में वो भेंट नहीं करते, मीलों दूर से अपने संबंध को तोड़ देते हैं।
अगर यह विरह संयोगवश बिना किसी स्वार्थ के होता है तो मुझे स्वीकार्य है। परंतु यदि यह संबंध केवल स्वार्थपूर्ति का माध्यम था तो इस विरह को मैं अस्वीकार्य करती हूँ।
मेरी दृष्टि में स्वार्थपूर्ति के लिए किया गया प्रेम निंदनीय है, यह प्रेम नहीं केवल छल है, केवल एक रची गई माया है।
मैं तो चाहती हूँ कि मिलन के समय जिस तरह प्रेमी प्रेमिका मिलते हैं। ठीक वैसे ही विरह में मिलें।
प्रेम की बुझती लौ नेत्रों में सर्वप्रथम बुझती प्रतीत होनी चाहिए। प्रत्येक वाक्य अर्थहीन हो जाए, और मन विरह के घनघोर सावन में भीग जाए, प्रेम हृदय से बह जाए।
अधरों पर वैसी ही कपकपाहट हो, जैसी प्रथम स्पर्श के समय देह में होती है।
विरह रूपी पुस्तक के स्वर इस तरह से अपना स्थान त्यागें की प्रेम के व्याकरण में अलंकार का फिर कभी प्रयोग ही ना हो और प्रत्येक रस भावहीन हो जाए।
क्योंकि विरह केवल विरह नहीं, संताप के चक्रव्यूह में फस चुका जीवन है।
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