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jagrut Patel pij

jagrut Patel pij

@jagrutpatel1479


लफ़्ज़ सारे रद्दी है
सामने वाला कबाड़ी है तो

पंचायत लगी है चराग़ों में,
और मुद्दा है हवा को कैसे हराया जाए

पुरसाँ नहीं अब कोई इस दौर में, नहीं दिल किसी पर क़याम है
हुस्न हँसी तो साहब इश्क़ है, दिल हँसी तो दगा आम है

ख़ु़द के ख़याल से ही उसे इश्क़ हो गया
मजनूँ को दिख गई थी हक़ीक़त सराब में

इशारे देर से समझ आते उसको
जो बे-दिल बे-ताब इश्क़ में मारा मारा फिरता है

શોધી શકાય તો શોધવી છે
મારા સપનાની એ કબર...

चराग़ सब के बुझेंगे यहाँ
हवा किसी की सगी नहीं होती...

न तालीम कि क़द्र दिखी, न साँसों का एहतराम,
कैसी सियासत है यारों, कैसा ये निज़ाम...

तेरी आँखों के सामने शहर कौन देखेगा
दरिया के सामने लहर कौन देखेगा

वफ़ादार सबको चाहिए
बनना कोई नहीं चाहता