मन शान्त नही आलोचना के सागर मे डुबकी लगाकर,
अपूर्णता की परिधि मे खुद खड़े रहकर , औरों को पूर्णता का, बोध कराकर|
मन शान्त नही आज ,अपनी योग्यता को आजमाकर ,
आधे अधूरे ग्यान का झण्डा लहराकर , हाय !जैसे धक्का
दिया हो किसी ने आकर|
मन शान्त नही सम्भल गया हो जैसे घबराकर|
बड़ी थकान भरी होती है यह आलोचना भी, फिर भी,
साहस के छीटें लगाकर |
मन शान्त नही अपना मुँह छुपा, दूसरे के चेहरे को आईना दिखाकर , हाय! मन शान्त नही खुद से खुद को दी गई पीड़ा को पाकर |
मन शान्त नही किसी को हराकर, स्वयं को कहीं पर विजेता कहाकर , किसी की कही गम्भीर बातो मे, मसाला मिला ठहाके लगाकर|
शान्त नही मन खुद से ,खुद कही ,कई बातो से बहलाकर,
बस ,खामोश खाली हाथ लौट आया, व्यर्थ मे अपनी ही ऊर्जा गवांकर|