काश मैं कह पाता
पर! क्या तुम सुन पाती
डर था मुझे
कहीं गुस्सा हो जाती तो
कहीं उठकर चली जाती तो
फिर मेरे पास नहीं बैठती तो
वैसे बात इतनी खास ना थी
तुम्हरा जानना भी जरूरी ना था
लेकिन काश मैं कह पाता कि
तुम्हारी आंखो में हमेशा
खुद को पाना चाहता था
तुम्हारे किस्सों में हमेशा
खुद को जोड़ना चाहता था
तुम्हारी कहानियों को हमेशा
तुम्हारे साथ जीना चाहता था
काश मै यह कह पाता
पर! क्या तुम सुन पाती