नहीं संतुष्टि मिलती है, जरूरत है नहीं फिर भी
मारें हक़ सभी का वो, ज़रूरत मंद लोगों का
दिखी औकात लोगों की, बीते कुछ महीनों में
सिमट कर रह गए हम सब, कुएं के मेंढ़कों जैसे
रहते उपदेश देते हम, देते हैं खुद को हम धोखा
सोचते हर्र लगे न फिटकरी, लेकिन रंग आए चोखा
रहते हैं लोग मतलब के, उठा पर्दा है चेहरों से
छुपाएं अब कहां जाकर, ओझल गुप्त इरादों को
समय है और मौका भी, आदमी बन के रहने का
मिटाएं दाग़ दामन का, लगाए हम जो बैठे हैं
सभी लायक बनें उनके , को निर्बल हैं जरूरतमंद
न अपना नाम शामिल हो, इतिहास के काले पन्नों में
#ज़रूरतमंद