गुलजार साहब की एक कविता
जिन्दगी की दौड़ मैं.
तजुबा कच्चा ही रह गया...|
हम सीख ना पाये 'फरेब
और दिल बच्चा ही रह गया...|
बचपन में जहां चाहा हँस लेते थे,
जहां चाहा रो लेते थे...|
पर अब मुस्कान को तमीज़ चाहिए
और आंंसु ओ को तन्हाई.. |
हम भी मुस्कराते थे कभी बेपरवाह अन्दाज़ से
देखा है आज खुद को कुछ पुरानी तस्वीरों में.
चलो मुस्कुराना कि वजह ढुंढते हैं..
जिंदगी तुम हमें ढुंढो...
हम तुम्हे ढुंढते हैं....!!