अगर हो सके तो जिंदगी,
मुझे मेरे घर ले चलो
दर-बदर हुए हैं कदम
सही डगर,अब ले चलो
मंज़िलों के रास्ते क्यूँ
अब रेंगती है दूरियां
मीलों के,पत्थर से पूछो
कितनी थकी नजदीकियां
चुभते हैं अपने ही कांटे
हमने जो बिखराये थे
रास्ते पांवों से चिपके
उस दिन बहुत घबराए थे
करुनेश कंचन