उद्योग धंधे ठप हुए,निर्माण पर पाबंदियाँ ,
महामारी काल में ,सरकार की सख्तियां।
पलायन की पीड़ा संग कराह रही ज़िन्दगियाँ,
कोरोना अभिशाप बना,मार्मिक परिस्थितियाँ।
पाँवों में फफोले पड़े,ओठों पर पपरियां,
भूख से हैं ऐंठती ,पेटों की अब अंतरियां।
पलायन की त्रासदी,मौत में बदल रही,
दुधमुहे शिशुओं की,बाप माँ छिन गयी।
मार दी कहीं ट्रक,या पटरियों पर ट्रेनों ने,
आँसुओं की धार बही, मासूमों नयनों में।
कौन देगा दूध अब ,कौन देगी रोटियाँ ,
बेसहारा हो गये ,ठोकरों का आसियां।