#शिकार
वो चीख नहीं पाए होंगे
उनके मजदूरी के किस्से, कहानियां नहीं बन पाए,
उनके लंबे सफर पर चलते कदमों का प्रोत्साहन बढ़ाने,
नियत समय पर तालियां और थालियां नहीं बज पाई,
और अगर सफर पूरा भी हो जाता उनका,
उनके स्वागत में टॉर्चे और मोमबत्तियां नहीं जलाता कोई,
उनकी जान देश हित में नहीं जा पाई,
वे शहीद भी कहां कहला पाए,
थके हारे, बेसुध पटरियों पर जब वे गहरी नींद में सोए होंगे,
अपनी अंतिम नींद पर जाते वक्त,
वह चीख नहीं पाए होंगे,
बस बिछ गए होंगे रेल की पटरी पर
जैसे बिछ जाते हैं कविता के अक्षर
किसी कागज के पन्ने पर,
और वह लिख ही गए जाते-जाते कविता अपनी जिंदगी की….
© हरदीप सबरवाल