दिल की बात सुनाने की गरज लेकर ही ।
इस तरह स्थिर हो राह देखता हूँ उसके आने की ।
सरदी गर्मी बरसात सबको मैंने महसूस किया है ।
अपने अन्दर ।सोचा था पिघलकर बहते हुए ही पहुंच जाऊँगा ।
पहुँच गया होता यदि वाष्पित न हुआ होता ।
मैं हताश नहीं हूँ ।मैं फिर आऊँगा ।और फिर बहूँगा ।
तब तक जब तक कि तुम्हारा साक्षात्कार नहीं होता ।
#दिल