Hindi Quote in Poem by S Sinha

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तरक्की तो इतनी कर ली है हमने
कि अब हम इंसान कम रह गए
ऊंच नीच अमीर गरीब हम बन गए
अलग अलग जाति धर्म में बंट गए
भूल गए कि लहू का रंग एक है
अस्पताल में जब जान पर बन आती है
मिलने वाले लहू की जाति धर्म नहीं पूछते
तरक्की की डींगें मारते नहीं थकते
कि चाँद मंगल तक जा पहुंचे
पर पैरों के नीचे से
ज़मीन खिसकती रही
रिश्तों की अहमियत
हाय हेलो भर रह गयी
अगर सही तरक्की करनी है तो
जाति धर्म की पाठशालाएं बंद कर दें
तब जग में अव्वल बनने से
ये दुनिया रोक नहीं सकती है

# Grow = तरक्की

Hindi Poem by S Sinha : 111426013
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