बावरे नैन
दर्शन को तरसते हैं तेरे पिया, मेरे यह बावरे नैन
छिन लिया है मोहन तुने, मेरे दिल का चैन ;
बता मुझे, धुन्द्ने तुझे, बिरहन मै, कहां जाऊ
बंध करू इन्हे, तो दर्शन की झलक पाऊ ;
खोलूं नैन तो, हो जाए तू ओज़ल;
बिरहमें तेरे, थक गई हूँ, सांसे भी है बोझल
तेरे बिरह में असवन बहाये, मेरे यह बावरे नैन;
बांसुरीया तेरी, सुना कर मीठी ताने, कर जाती हैं जिया बेचैन
तरसाना, तड्पाना इतना, ठीक नही है प्रितम मेरे ,
शाम सवेरे, नित्य तरसु मैं, दर्शन को तेरे
नज़र फेर कर, मुझे ठुकरा कर, क्या मिलेगा तुझे ;
बस माँगू इतना, दर्शन दिखला जा मोहन मुझे ।
Armin Dutia Motashaw