इतिहास की कारीगरी भी क्या मन लुभाई थी
संयोग संतुष्ट करने सीता लंका चली आई थी।
कौशल्या की व्यथा दुनिया समझ ना पाई थी
बरस चौदह विदा करके वस्त्र श्वेत अपनाई थी।
कोठरी में बंधी देवकी लला सुख ना पाई थी
भाई का उद्धार करने संतान आहुति चड़ाई थी।
माता द्रौपदी कालावश चीराहन औे. सताई थी
पति प्रणेश के हाथों चौसर में धोखा खाई थी।
राधा कृष्ण मोह में अति पीड़ित बतलाई थी
सहस्त्र सोलह रानी में सारे पद गंवाई थी।
मान- लोभ में महाभारत, कथा अति दुखदाई थी
सूर्पनखा मोह ने रामायण को आग लगाई थी।
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