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जब तुमने किसी स्त्री में सौन्दर्य देखा, अगर तुम्हारी आँखे उज्जवल हो , तो तुम पाओगे: यह परमात्मा की छवि झलकी ! तुम स्त्री के प्रेम में न पड़ोगे; स्त्री के माध्यम से परमात्मा के प्रेम में पड़ोगे !
जब भी प्रेम हो , तो परमात्मा को खोजना; पदार्थ पर मत अटक जाना ! पदार्थ पर अटके----तो वासना और परमात्मा की सूझ-बूझ मिलने लगे--तो प्रार्थना ! पदार्थ पर अटके तो नीचे की तरफ गये ---कीचड़ की तरफ और अगर परमात्मा की सुध-बुध स्मरण आने लगे , तो चले ऊपर की तरफ ! पंख लगे तुम्हे ! उड़े तुम आकाश की तरफ ! अनंत की यात्रा पर निकले !
पदार्थ में क्या सौन्दर्य हो सकता है ? शब्द में क्या सार हो सकता है ? शब्द के पार से आता है सार ! शब्दों में केवल झलकता है ! जैसे दर्पण में कोई प्रतिबिंब झलकता है ! जैसे रात आकाश में चाँद-तारे हो, और झील में झलकते हों ! मगर झील में डुबकी मत मार लेना --- चाँद-तारे खोजने के लिए ! वहां चाँद नही है ! सिर्फ चाँद झलकता है !
संसार को ज्ञानियो ने माया कहा है ! यहां असली है नही---सिर्फ झलकता है! यहां असली स्वप्नवत है ! यहां असली की परछाई पड़ती है; प्रतिबिंब बनता है ! यहां असली की प्रतिध्वनि सुनाई पड़ती है, लेकिन असली है नही !
🙏🏼🙏🏼Anil Mistri