काश!!!!
काश में बेटी न होती।
तो मेरा भी घर होता।
न बचपन से ही में पराई हो जाती।
में भी सपने देखती और पूरे करती।
न मुझ पे कोई मर्द राज करता,
फिर वो चाहे पिता हो, भाई हो या पति।
मुझे भी कोई अपना कहता।
न कोई मेरे बाहर जाने पर टोकता।
न मुझे कोई छूने की चाह रखता।
न मुझे घर की चार दीवारों में कैद रखता।
न किसी अनजान से मिलने की रोक टोक होती।
न ही किसी अनजान के हवाले सौप दिया जाता।
मेरी भी ख्वाइशें पूरी होती।
सपने मेरे भी है आसमान को छूने के।
शायद वो पूरे हो जाते।
काश में बेटी न होती,
मुझ में भी जीने की चाह होती।
मर्दो की गुलामी की कैद से परे होती।
मेरा भी सम्मान होता।
में भी अपने नाम से पहचानी जाती।
घर के बाहर जाते ही लोगो की तीर थामी हुई नज़रो से दूर रहती।
न ही मेरे माता पिता को मेरी बढ़ती उम्र की फिक्र होती।
न समाज की बाते होती।
मेरा खुद का घर होता।
न ही झूठी दिखावे की किसीको चिंता होती।
न ही में दर दर भटकती।
मेरी खुद की जिंदगी होती।
काश में बेटी न होती।