कोई लौटा दे मुझे वो दिन
कोई लौट दे मुझे वो दिन
जो जीता था कभी
ना चिंता की छत थी
ना ग़मो की बरसात
रेहता था आँचल के साए में
दुलारों के आंगन में
अब ना जाने कहाँ खो गए वो दिन
कोई लौट दे मुझे वो दिन
खेल ही रेहता था हर पल में
चाहे दिन में या काली रात में
वो क्रिकेट के चौके छक्के
लुका चुप्पी की बढ़ती मुश्किलें
वो ज़ोर से लिंगोरचा का शोर
अब तो सन्नाटा ही पसरा चारो ओर
पर अब ये सब कहाँ रहा
मोबाईल गेम में ही सब का जीवन रहा
याद आते हैं आज भी वो शरारत भरे दिन
कोई लौटा दे मुझे वो दिन
वो गर्मियों की छुट्टियां की आस रेहती थी
नानी के घर की प्यास रेहती थी
पेड़ से चोरी के आम खाना
पड़ोसियों का काम बढ़ाना
उन शरारतो की भी अपनी ही चमकार थी
जहां डाट में भी प्यार की झंकार थी
पर अब ये रिश्ते कहाँ रहे
अपनो को छोड़ अंजानो संग जीवन रहा
याद आते हैं आज भी वो निर्मलता भरे दिन
कोई लौटा दे मुझे वो दिन
त्योहारों की भी अलग ही बात थी
उनमें जीने की अपनी ही शान थी
पड़ोसियों के घर में फटाके फोड़ ना
राह चलते लोगों को रंग में रंग ना
अपना पन रेहता था सब में
परेशानियों को बात ते सब में
पर अब ये हमसाए कहाँ रहे
खुद को भूल औरो के परवा में जीवन रहा
याद आते हैं आज भी वो चंचलता भरे दिन
कोई लौटा दे मुझे वो दिन
टूटा हैं नाता सबसे
छुटा हैं साथ सबसे
भुला हु वो गलियाँ ओर चौबारे
रेहता हु अकेला इन मेहलों के साएं
सताती हैं यादें जीने के लिए
ढूंढता हु एक कोना रोने के लिए
अब ना जाने कहाँ खो गए वो दिन
कोई लौटा दे मुझे वो दिन
- कुमार