समझ कर नहीं पढ़े हैं
आर ० के ० लाल
ज्ञानदेव बहुत बड़े पंडित थे। एक बार उन्होंने काशी के पंडितों को शास्त्रार्थ करने के लिए ललकारा । काशी के पंडित हैरान थे कि इनको कैसे पराजित करें और अगर वे पराजित नहीं होते तो काशी की महिमा ही मिट जाएगी।
काशी के सभी पंडित कबीर जी के पास गए और उन्हें किसी तरह शास्त्रार्थ करने के लिए तैयार कर लिया, जब कि कबीर जी कह रहे थे कि उन्हें शास्त्र की बात नहीं आएगी।
निश्चित समय पर ज्ञानदेव जी आए तो कबीर जी ने उनको प्रणाम किया और बोले, " हमारे नगर के पंडितों ने इस अबोध बालक को यश देना चाहा इसलिए मुझे आगे कर दिया है। बाबा हम आपसे शास्त्रार्थ क्या करें । आप पूछिए, यदि मेरी समझ में कुछ होगा तो कहूंगा"। ज्ञानदेव ने कहा, " नहीं पहले आप पूछो"।
कबीर जी ने उनसे एक ही प्रश्न पूछा कि पंडित जी, आप पढ़कर समझे हैं कि समझ कर पढ़ें हैं ? कृपया जवाब दीजिए ।
ज्ञानदेव जी कबीर जी की वाणी को समझ गए। उन्होंने उनसे सिर्फ इतना ही कहा, " मैं कल सुबह भगवान विश्वनाथ को प्रणाम करके यहां से चला जाऊंगा" और दूसरे दिन वे काशी से निकल गए ।
कबीर जी कहा करते थे , " शास्त्र सीख लेने से कोई बुद्धिमान नहीं हो जाता, उसमें विद्वता भी जरूरी है"।