वो तुलसी का पौधा
जो मैंने तुम्हारे लाख कहने पर
लगाया था आंगन के पश्चिमी कोने में
जिसकी पत्तियां खिलती-मुरझाती हैं
आज तुम्हारें आंगन में होने या न होने से
पता नहीं क्यों पर तुम्हारे जाने के बाद
सुख-समृद्धि बांटना भूल गया वो पौधा,
आश्चर्य है कि तुम पूजती थी उसे और फिर मुझे
क्या तुम्हारा पूजना तुम्हारे वात्सल्य का अंश है?
और तुम्हारे एक दिन न पूजने से
यह किस विपदा का दंश है
लौट आओ कि भगवान बन चुका है भक्त
लौट आओ की सिर्फ पत्थर रह जाएगा
तुम्हारा पूजा हुआ पत्थर सख्त
नहीं तो अबकी जो बयार चलेगी वो पौधा जड़ से उखड़ेगा
और ये घर न रह जायेगा सुख-समृद्ध
©प्रशांत पारस
#Kavyotsav2