कोरोना : गौरैय्या और कबूतर
फुदकती नन्हीं सी गौरैय्या ने
छज्जे पर बैठे एक कबूतर से
कुछ आश्चर्य से पूछा ..
आख़िर आजकल सब ओर
इतना सूनापन क्यों है ?
क्यों नहीं दिखते सब जन मानस ?
क्यों हैं राहें सूनी सूनी सी सब ?
और कहा
गौरैय्या ने कबूतर से
कि तुम तो आदमी के
इतने करीब रहते हो
बताओ ज़रा कि तुम आदमी की
इस दशा, इस सारे मंज़र पर
क्या कहते हो
गुमसुम से बैठे कबूतर ने
उस नन्हीं सी गौरैय्या से कहा ...
मैं भी नहीं समझ पाया हूं
मनुज का ये सारा व्यवहार ...
बड़ा आश्चर्य है -
जाने क्या हुआ है इन दिनों !
सब मनुज बंद हो गए हैं
भीतर घरों में अपने !
जाने किस दानव के डर से
वो लुके छुपे बैठे हैं
अपने गृह पिंजर में
सभी जन मानस ने ढेर सारा
दाना इकट्ठा कर
अपना अपना घर भर लिया है
पर फिर भी जाने क्यों अपने भीतर
उन्होंने एक अनजाना सा
संशय और भय भी भर लिया है !
भर अनाज घर में इतना
नहीं डालते मुझे वो दाना
जाने क्या सोचते रहते हैं
हाथों को मल मल कर धोते रहते हैं
जाने क्या क्या बोलते रहते हैं
घर में ही बस डोलते रहते हैं
आजकल आदमी आदमी से ही
कुछ डरा डरा सा रहता है
हवाएं तो साफ हैं, महकती हैं
फिर भी जाने क्यों
मनुज श्वास थामें अपनी
घर से बाहर सहमे सहमे
नाक मुंह बांधे निकलता है
पता नहीं आजकल
आदमी को क्या हो गया है !
उसका वो सारा रौब , उसका वो खौफ
जाने कहां खो गया है ?
बाहर का सारा शोर, भागम भाग छोड़
जाने क्यों भीतर सो गया है ?
अपने एक प्रश्न के उत्तर में
पाकर इतने सारे प्रश्नों की लड़ी
गौरैय्या फुर्र से खुले में
स्वच्छंद उड़ चली
और
मनुज के गृह पिंजर के भीतर
से उम्मीदें छोड़
घर के छज्जे को छोड़
कबूतर भी उड़ चला
दूर कहीं दाने पानी की खोज में
: - भुवन पांडे
#आश्चर्य