दो किनारों की तरह
ज़िन्दगी हैं मेरी नदी के
दो किनारो की तरह
एक तरफ शोर में जीत हु
तो एक तरफ तन्हा सा रेहता हु
एक ओर अपने भी पराये से हैं
दूजी ओर अनजाने भी जाने पेहचाने से हैं
असमंजस में हु पड़ा
चुनु कौनसा किनारा इस तरह
जहां रेहती हो शांति चारो ओर
बिता ज़िन्दगी उस किनारे की ओर
- कुमार