#मूल्य
मूल्य ही तो चुका रही थी अपने स्त्री होने का
कभी बेटी बनकर तो कभी बहन बनकर
बहु ,पत्नी, मां सब रूपों मे मूल्य ही चुका रही है वो
स्त्री होने का
जब भी चाहा उड़ान भरना अपने सपनों की, मूल्य चुकाया सपनों की उड़ान को जिम्मेदारी के पिंजरे मे दम तोड़ते हुए.
मूल्य ही तो चुका रही थी अपने स्त्री होने का ।