My Eventual Poem...!!!
यारों कल तक बात बातमें तानें मारतें थे
कि अरे घरकाम भी कोई काम है क्या
कभी ओफिस आ कर भी देखा है क्या
बोस के मूड की भी कोई चाबीं है क्या
शाबाशी कब कड़वी वाणी पता है क्या
आज करना पड़ा झाड़ू 🧹 पोछा बर्तन
सफ़ाई दाल सब्ज़ी 🍅रोटियाँ पकवाई
उपर से बच्चों की नई माँग पता है क्या
क्यों गृह-लक्ष्मी कहलाती पता है क्या
कमर से कमरा कैसे बनता पता है क्या
जात रगड़ भात पकत कपड़ा धूलवत व
हाथों की कलाई मुड़त कैसे पता है क्या
प्रभु ठीक करत जो करत जाना अभी क्या
✍️🥀🌹🙏😀😇😂🙏🌹🥀✍️