मेरे मन में इतने विचार आते हैं,
जिन्हें मैं कागज के पन्नों पर उतार लेना चाहती हूं,
लेकिन मैं ऐसा कर नहीं पाती,
मेरा साथ कलम भी नहीं दे पाती,
क्योंकि मेरे हाथों में चूड़ियां हैं,
जो कि बेड़ियों के समान है,
मेरे ऊपर जिम्मेदारियां हैं,
मेरे लिए सीमा की लकीर खींच दी गई है,
मेरा क्षेत्र निर्धारित कर दिया गया है,
मेरे लिए प्रत्येक वो कार्य वर्जित है,
जिससे मेरा विकास हो पाता,
न जाने कितने नियम बनाकर मुझे सौंप दिया गया है,
मुझे उन उमड़ते घुमड़ते विचारों को भी बाहर न लाने की सलाह,सुझाव या दबाव डाली गई है,
उस दबाव डालने वाले को डर है कि कहीं मेरे यह विचार क्रांति का आह्वान न कर दे,
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