ये रात अपनी है, ये माहताब अपना है,
यह सारा संसार अपना है। यह रात भी अपनी, ये दिन भी अपने। यह सूरज भी अपना, यह चांद भी अपना।
ये रात अपनी है, ये माहताब अपना है,
यह रात अपनी है, यह चांद अपना है।
यहीं पे वक्त का सैले-रवां ठहर जाए।
काश, ऐसा हो सकता कि रात के इस सौंदर्य में ही समय का कारवां ठहर जाता! काश, ऐसा हो सकता कि फिर कोई बदलाहट न होती!
ऐसा तो हो नहीं सकता। ऐसा चाहोगे तो मुश्किल में पड़ोगे। वक्त का कारवां जरूर ठहरता है, मगर रातों और दिनों में नहीं ठहरता। वक्त का कारवां सिर्फ ध्यान में ठहरता है, प्रार्थना में ठहरता है। समय रुक जाता है, समय भूल जाता है, विस्मृत हो जाता है। मगर यह आकांक्षा तो उठती है, कभी रात के सौंदर्य को देख कर कि बस अब सब यहीं रुक जाए। बस अब जैसा है, ऐसा ही रहे। यहीं से आसक्ति पैदा होती है। यहीं से प्रेम मोह बनना शुरू हो जाता है।
ये रात अपनी है, ये माहताब अपना है,
यहीं पे वक्त का सैले-रवां ठहर जाए।
हमें भी चलना है मंजिल तलक मगर ऐ काश,
जरा सी देर को ये कारवां ठहर जाए।
पता तो हमें है कि मंजिल तक चलना है, कोई दूर, अज्ञात मंजिल राह देख रही है, मगर फिर भी मन मान लेना चाहता है कि थोड़ी देर को परिवर्तन न हो, यह नदी की धारा रुक जाए। और जब भी तुम्हारा मन चाहता है कि कुछ रुक जाए, धारा रुक जाए, परिवर्तन रुक जाए, तभी तुम बंधन में पड़ जाते हो। रोकने की आकांक्षा बंधन है। जब भी तुम चाहते हो कि चीजें बस ऐसी ही हो जाएं--इतनी सुखद है अभी यह बात, अभी इतना सुखद है यह क्षण, कि कहीं छिटक न जाए हाथ से, कहीं खो न जाए, कहीं यह नदी की धार बह न जाए, कहीं समय बदल न जाए--जहां तुम्हारे मन में ऐसी आकांक्षा जगती है, बस वहीं प्रेम की हत्या शुरू हो गई।
और ऐसी आकांक्षा हम सबके मन में जगती है। कौन नहीं चाहता कि सुख का क्षण सदा को ठहर जाए और दुख का क्षण कभी न आए? मगर न तो सुख के क्षण ठहरते हैं, न दुख के क्षण आने से रुकते हैं। समझदार वह है, जो सुख के क्षण में भी साक्षी होता है, दुख के क्षण में भी साक्षी होता है। और जो साक्षी होता है, उसके लिए समय ठहर जाता है।