ग़ालिब अंतिम सत्य यथार्थ नही
इश्क़ की अंतिम बाज़ी मात नहीं
आओ हम भी खेले नए ढंग से
ये खेल है सदियों पुराना
लबो पे मेरी वही सुरमयी सी धुन
कोई खनक उठे अब इन ग़ज़लो में
फ़िर ज़ेहन में तुमको ही उतार के
आज लिखे ये मन बावरा जैसे वही तराना
है सदियों पुरातन ये चलन
गाये मन संयासी फ़िर उसी इश्क़ का फ़साना ।
#अंतिम