यदि विवेक शुद्ध है
शत्रु को परास्त कर,
अखण्ड अदृश्य आस्था पर
विश्वास की आँख रख।
जनम यदि हुआ है
मरण भी अटल है,
साहस के लोक का
आलोक ही प्राण है।
दिगंत भी देख लो
वीरता ही पहिचान है,
प्यार के लिये सदा
शत्रु को परास्त कर।
वैभव धरा का सभी का है
विवेक से भोग लो,
उठी हुयी पताका में
नाम अपना जोड़ दो।
* महेश रौतेला