"अन्धी भीड़ का हिस्सा होने से तो अच्छा अकेला चलना "
बहुत सुनती आई हूँ मै यह एक वाक्य सोचा ! अब जवाब ही दे लूँ ." चलिए अकेले कौन मना करता है " पर यह अकेलापन आपको कहाँ ले जायेगा जहाँ जायेगा स्वार्थ की एक दुनिया बसायेगा . यदि आँख होते हुए अकेलापन भाये तो बेहर है हम अन्धे ही बन जाये इतिहास गवाह है जब भी हमने स्वार्थ की बात की है .हमे सदियो तक दासता झेलनी पड़ी है . आँखो की गुलामी से अच्छा है अन्धी स्वतंत्रता . बहुत आग जल रही है दुश्मनी की एक दीपक सौहार्द का जला तो क्या बुरा हुआ . हमने बत्ती बुझाई क्योकि हम बिखरे थे . एक दीपक की रोशनी मे समाहित हो गये . हम अलग अलग जगह पर खड़े होकर भी एक दिख रहे थे. करोना मरे न मरे किन्तु हम तो जिन्दा हो गये .आँखो को यह गलत लगे तो अन्धा होना बेहतर है.