भारत वर्ष का प्रत्येक नागरिक भावना प्रधान 90% होता है ऐसे कई उद्धरण देखले को पचास साल पूर्व के ले लो या फिर और भी कई ऐसे चाहे देश मे आई विप्पति के मौके हो महामारी का दौर हो चाहे अपने मुहल्ले परिवार पड़ोस में रहने बाले लोग हो अपन किसी का दुख नही देख सकते किसी को भूखा सोते नही देख सकते अपनी थोड़ी सी मदद से यदि किसी को खुशी मिलती है तो उसकी मदद करने के लिए आगे आ जाते है ये भावना सिर्फ और सिर्फ अपने भारत देश मे रहने बाले जनों में कूट कूट के भारी होती है और अक्सर हमने अपने बड़े बूड़ो से भी कहते सुना है अरे अपन तो मदद करो सामने बाले की करनी उसके साथ उसको ऊपर बाला दंड देना कल के दिन सब यही कहेंगे तूने तुम्हारे घर रहते हुये भोजन क्यो नही कराया मदद कर सकते थे फिर क्यो नही की ? क्या सब अपने साथ मरने के बाद सर पर उठा कर ले जाओगे सब का सब यही रखा रह जायेगा साथ परलोक जाएगा तुम्हारा यही पुण्य मदद करना दुसरो के दुख में भागी बनना यही अपने संस्कार है जो हर उस मानव में कूट कूट कर उनके मा बाप से धार्मिक ग्रंथों में दिए गए उपदेशों ने सिखया गई भगवान कृष्ण ने भागवत गीता में कहा भी है "कर्म किये जा फल की इक्छा मत कर ये इंसान जैसे कर्म करेगा वैसे ही फल देगा भगवान" ये मेरा आज के भावुकता पर अपना निजी विचार है ।
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