ये हुआ हे जो,कोई इतफ़ाक नही,
उम्र आवारगी हे,ये शर्मसार नही।
दुआ मांगे फ़क़ीरा पूरी हो ना हो,
ख़ुदा बंदगी हे,कोई उपकार नही।
इश्क झरना हे,उसका किनारा न हो,
और हो भी तो उसका उपचार नही।
ये महलो वाले दीवाने हुजरेके क्यूँ हे?
जाना चैन-ए-शुकुन वहा बिस्तर नही।
हम आपमें रहे येतो इश्के इबादत हे,
वरना हम भी हुश्न के तलबगार नही।
Dp,"प्रतिक"