जंगल जंगल पता चला है,
शहरमे इंसान जुज रहा है।
न कोई घरके बाहर गया हे,
न कोई घरके भीतर आया है।
एक दूजे की बाह थामने,
हर एक रिश्ता जुज रहा है।
न कोई घरके बाहर गया हे,
न कोई घरके भीतर आया है।
माँ बच्चोको दूध नही पाती,
न गोद में लेकर लोरी सुनाती।
इसके आगे अब क्या कहु में,
दिलमें अच्छी बात नही आती।
जो बोया वोह पाया हे,
क्या इंसाने खेल रचाया है।
धरती सींची आग उगाई,
प्रकृतिकी लाज दुभाई।
मानवता को मारके हमने,
अपने घरमे आग लगाई।
दुब मरो अब शिक्षधारि,
तुमसे अच्छे गांव गवारी।
अपनी रोटी सेकने खातिर,
रिश्तोकि हर नीव जलाई।
क्याथा भारत मेरा भारत,
अब मूर्दोका शहेर भारत।
जिन्दा को न पूछा जाइ,
मुर्दो पर यहाँ दिए जलाई।
गाँव छोड़ कर शहर आए,
जीवनमे बड़ा कहर लाई।
जंगल जंगल पता चला है,
शहरमे इंसान जुज रहा है।
न कोई घरके बाहर गया है,
न कोई घरके भीतर आया है।
Dp,"प्रतिक"