ख़ुशी की तलाश में हम इधर उधर भटकते हैं जबकि ख़ुशी अपने अंदर ही छिपी है जैसे हिरण कस्तूरी की तलाश में भटकता है जो उसके अंदर ही है .
चलते चलते
1956 की फिल्म बादल का मुकेश का गाया गीत ..
मैं राही भटकने वाला हूँ कोई क्या जाने मतवाला हूँ
ये मस्त घटा मेरी चादर है ये धरती मेरी बिस्तर है ....
#भटकना