#सही
जीवन मे सही कुछ भी नही और गलत का अस्तित्व नही
यह एक ऐसा गूढ़ रहस्यपूर्ण प्रश्न है जिसपर यदि लिखा
जाये तो कई किताबे भर जायेंगी पर निष्कर्ष फिरभी न
निकल पायेगा खैर शब्द सीमा और समय प्रबन्धन मे
रहकर यहाँ कुछएक शब्दो को संबोधित कर अपने विचार
रख रही हूँ क्योकि लिखने वाले के साथ पढ़ने वाला भी
घड़ी की सूईयों द्वारा नियंत्रित है . मेरे विचार से यदि देखा
जाये तो सही बात वो है जो किसी को बुरी न लगे
अधिकतर बुरी भी वही बात लगती है जो कहीं न कहीं
किसी न किसी के विचारो का हनन कर रही होती है .
कई बार वैचारिक विविधता भी असंतोष का कारण बन
जाती है पर इसका मतलब यह कदापि नही कि जो बात
कही गयी हो वही सही हो या फिर जो उसका खण्डन
कर रहा हो ,यहाँ पर दोनो ही गलत नही क्योकि दोनो ही
अपने पारिस्थिक परिवेश मे रहकर अपनी बात को
प्रमाणित करने का प्रयास कर रहे है .जहाँ एक को कोई
बात सही लगेगी वही दूसरे के लिए गलत हो सकती है
उदहारण के लिए आरक्षण जो कि एक बहुत ही संवेदन
शील मुद्दा है जिसे एक कालखण्ड मे उसकी उपयोगिता
को समझते हुए लाया गया था किन्तु आज के समय मे
इसके स्वरूप को बदला जाना आवश्यक है क्योकि समय
के साथ जात- जात कोई विशेष मुद्दा नही रहा इसलिए
यह जातिगत न होकर आर्थिक कमजोर वर्ग को पोषित
करने वाला होना चाहिए चाहे वह किसी भी जाति या
मजहब का हो . लेकिन जहाँ यह न्यायोचित है वहीं इसका
विरोध करने वालो की कमी नही जितना इसके पक्ष मे है
उतना ही विरोध में...ruchi