सारी दुनिया में जो मची है भूकंपी ये दौड़ ,
कोई नहीं किसीका देखो मुड़कर चारों ओर|
फूल पीर के उगे हुए हैं कैसे निकला जाए ?
आगे-पीछे नहीं है कोई किसे–कौन समझाए ??
ईर्ष्या में सब भीग रहे हैं ,काँटों को ही सींच रहे हैं,
कैसे बात बनेगी कोई जब सारे ही तने खड़े हैं |
अभिलाषा की बांधे पोटल,अहं भाव दिल के आँगन में,
आँगन साफ़ करेंगे कैसे अहं यहाँ जब अड़े हुए हैं ?
पहरेदार पड़े हैं सोए ,कैसे उनकी नींद खुलेगी ?
चिंता करने से न बने कुछ जब तक राह न ढूंढें मिलकर,
बैसाखी लेकर हाथों में मिलती राह न कोई प्रस्तर |
तनकर होना होगा सबको खड़ा यहाँ पर साहस से ही,
अँधियारा छूमंतर होगा जब मुट्ठी बांधेंगे जमकर | |
सब स्वस्थ्य रहें ---