अल्लाह हू अकबर जय श्री राम मचा गए दोनों कोहराम ।
शांति अहिंसा दया प्रेम सौहार्द का हो गया काम तमाम ।।
माता रोई बच्चे चीखे प्रेम खड़ा था आँखें भींचे ।
वृद्ध दया की चौखट पर बैठा था सर करके नीचे ।।
बहरी अंधी भावनाओं ने नगर बना डाला श्मशान ।
शादी की शाहनाई से गुंजित होना था जिस घर को ।
रक्षा करने की इच्छा से छोड़ चला आया जो घर को ।
गोली मारी आग लगाई पत्थर मार चले नादान ।