सुदंर कविता ..
विषय .ओस की बुंद ...
धरती की धानी साडी पर ,मोतीन सी दिख जाए ।
सबकी आँखों को अपने ,तरफ सहज खीच जाए ।।
धास ,पत्तों पर सुबह सवेरे ,महारानी बैठी सी मुस्काए ।
छूंते ही सबके देखते ,छूंमतर सी हुई जाए ।।
कितने करुँ बखान तेरे ,तू अनमोल मोती सी भाए ।
धरती की सुदंरता में ,तू चार चाँद ही लगाए ।।
जब सूर्य की पहली ,किरण पड़ते ही तू दिख जाए ।
दूर से ही हीरे की तरह ,चमकती हुई तू महकाए ।।
ओस की बुँद सब लोग कहे ,तू सबके दिल हरषाए ।
तू तो प्रकृति का अनमोल ,श्वेत बुंद सी कहलाए ।।
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